Wednesday, January 26, 2011

अपना एक मुकाम बनायेंगे

बोलता हर कोई
क्या मुझे मिला
देश ने क्या दिया
नेताओं ने देश का
बेडा गर्क किया
सोचा कभी हमने
क्या देश के लिए
किया
क्या कुछ भी दे पाये           
देश को ?
खोये रहे खुद को
पाने के लिए
खुद की पहचान
बनाने के लिए
कोई ऐसा काम
किया
क्या शहीदों को कभी
याद किया ?
क्या कभी खुद से आँख
मिला पाओगे ?
क्या देश को क्या सम्मान
दिला पाओगे ?
लड़ते रहते हैं
अपने स्वार्थ खातिर
देश को बाँटने खातिर
क्यों ?
आओ मिल कर
एक कसम खायें
गरीबी ,भुखमरी
भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी
से देश को मुक्त करायेंगे 
अपना एक मुकाम
बनायेंगे |

10 comments:

  1. आप को इस कविता के लिए शुभ कामनाएं

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  2. देशभक्ति से ओतप्रोत और जगाने वाली रचना. बहुत सुन्दर प्रयास.

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  3. Bāt hameshā ghūm fir ke vahīṃ pe ā jātī he:

    Agar āpne apne bacoṃ ko dūsroṃ kā bhalā karnā nahī sikhāyā to āp ek ace samāj ki kalpanā nahī kar sakte.

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  4. सटीक आवाहन ..अच्छी प्रस्तुति


    word verification hatayen

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  6. aap sabhi logon ka tahe dil se shukria jo meri rachna ko pasand kiya aap jaise gunijanone

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  8. बहुत सुंदर ...यह आशावादिता बनी रहे.....

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  9. आपका आक्रोश, आपका आवाहन दोनों अच्छे हैं... शुभकामनाएं..

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