Friday, May 20, 2011

इंसानियत


जिन्दगी चलते चलते
यूं रुक गई
थम गया वक़्त
आसमां जैसे रो पड़ा
धरती का सीना चाक
हो गया
एक व्यक्ति पड़ा
सड़क पे
तड़प रहा
खून से लथपथ
जिन्दगी -मौत से
लड़ रहा
कितने लोग निकले
वहां से
न जाने और कितने
निकलेंगे
किसी को दया नहीं आई
किसी का दिल नहीं
पसीजा
इतना पत्थर दिल
कब से हो गया
इंसान
अब वहां शान्ति
व्याप्त है
क्यूंकि वो
तडप चिल्लाना
सब समाप्त
हो गया
क्योंकि वो व्याक्ति
चिरनिद्रा में
सो गया
अब यहाँ
और इंसानियत भी जैसे
सो गई
उस व्यक्ति के साथ

jyoti dang

7 comments:

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (21.05.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  2. इंसानियत भी जैसे
    सो गई
    उस व्यक्ति के साथ

    sach me aisa hi hota hai........

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  3. क्योंकि वो व्याक्ति
    चिरनिद्रा में
    सो गया
    अब यहाँ
    और इंसानियत भी जैसे
    सो गई
    उस व्यक्ति के साथ


    गहन अनुभूतियों की मार्मिक अभिव्यक्ति ...

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  4. Apki is rachna se kuch yaad aaya mujhe. .
    Dekho aaj bharat me kya ho gya, jaag gya saitaan insaan so gya..
    Jai hind jai bharat

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  5. क्योंकि वो व्याक्ति
    चिरनिद्रा में
    सो गया
    अब यहाँ
    और इंसानियत भी जैसे
    सो गई
    उस व्यक्ति के साथ

    didi bahut sacche vishay par aapne likha hai....

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  6. वाह... बहुत खूब... बहुत ही गहराई का साथ लिखा है!

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