Friday, July 15, 2011

क्यों मैंने ये दुनिया बनाई

देखा जब मैंने वो मंज़र 
हर तरफ फैला 
खूनी समंदर 
चारो ओर चीख पुकार 
लहू-लुहान तड़पते लोग 
हर तरफ मची भगदड़ 
हर आँख हुई नम
चारो तरफ
उठे मदद 
के हाथ 
छुपाये अपने गम 
सोचने पे मजबूर हुआ 
आज भगवान् 
भी सोच रहा मैंने 
ये दुनिया क्यों बनाई 
ये इंसान रूपी जीव 
को हुआ क्या 
इतना हैवान 
अपने स्वार्थ हेतु 
क्यों मार रहा 
अपने ही भाई बंधू को 
ये इंसान जानवर क्यों 
बन रहा 
अपनों के सीने में 
खंज़र क्यूँ घोप रहा 
इस स्वर्ग रूपी धरती को 
जहन्नुम क्यों बना रहा 
धिक्कार है मुझे 
खुद पे 
क्यों मैंने ये दुनिया बनाई ?

5 comments:

  1. कल 17/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. आज भगवान्
    भी सोच रहा मैंने
    ये दुनिया क्यों बनाई
    ये इंसान रूपी जीव
    को हुआ क्या
    इतना हैवान
    अपने स्वार्थ हेतु

    क्या कहने
    बहुत सुंदर
    बधाई

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  3. गुपचुप तमाशा देखे
    वाह रे तेरी खुदाई..
    काहे को दुनियाँ बनाई तूने काहे को दुनियाँ बनाई...

    kripayaa word verification hataa len...

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  4. bilkul sahi likha hai apne...
    jai hind jai bharat

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