Tuesday, October 16, 2012

जिंदगी बोझ मत बन ...दोस्त बन मेरी

थक चुकी हूँ अपनी ही लाश को 
अपने ही कन्धों पर ढोते ढोते 
हर सुबह होते जिन्दा होती हूँ 

जिन्दगी की मुश्किलों से मुझे 
होना पड़ता है दो-चार हर रोज 
लोगों की आदत है भावनाओं से
खिलवाड़ कर सिर्फ खेलना सबकी 
विश्वास करना कमजोरी है मेरी 
विश्वास करती हूँ और बिखरती हूँ 

रत्तीभर भी मेरे अपनों को भी
मेरे दुःख से कोई वास्ता नहीं
उनका बस एक ही मकसद है
मेरी हस्ती और ख़ुशी को मिटाना

मेरे ज़ख्मों को कुरेदना बस
ताकि तड़पती रहूँ मैं दिन रात
मैं एक सुलगती हुई चिता हूँ
अरमानों की हूँ, यही जिन्दगी है
बस मेरी मरकर रोज़ जीने की

सोचती हूँ आजाद हो जाऊं मगर

रिश्तों की डोर उलझी है जाले सी

जितना सुलझाती हूँ और उलझती है

सांस लेना भी दूभर है अब मेरे लिए

जिंदगी बोझ मत बन ...दोस्त बन मेरी 

4 comments:

  1. बेहद मार्मिक मगर यही है आज भी नारी जीवन

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  2. मन की व्यथा को कागज पर बखूबी उतारा है....
    व्यथित मन से लिखी रचना सशक्त बन पड़ी....

    अनु

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  3. बेहद मार्मिक रचना...

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  4. dost banane ki koshish kariye....sirf zindgi ke kandhe par sir rakh kar rone ki bajaye apne sukh ke pal dhoondh kar use hasane ki koshish to kijiye...dekhiye....fir zindgi dost bhi banegi aur dosti gehrayegi bhi.

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