Saturday, January 15, 2011

इश्क़ में जल के धुआँ हो गयी

बेजान हो चली मैं तुझसे प्यार करके
निशार हो चली मैं,तेरा दीदार करके

इल्जाम थे हर तरह के, फिर भी बरी रहे
दुल्हन तेरी बनी मैं सोलह श्रंगार करके

तिनके मेरी वफा के न अब डूब जाएँ
कश्ती सी चली मैं दरिया को पार करके

हो गये महफूज़ जिन्दगी की राहों में
साजन संग चली मैं ऐतबार करके

साल-हा-साल वो लम्हा गुज़र गया
रहगुज़ारों पे लुट गई मैं इकरार करके

ज़िन्दगी इश्क़ में जल के धुआँ हो गयी
"ज्योति" भी जल गयी तुझसे प्यार करके

Friday, January 14, 2011

खुदा खुश हो गया

उस सघन अंधकार में
मन के उस अवसाद में
गहरी गुफा में
एक साया टहल प्रतीत हुआ
इस छोर से उस छोर
उस छोर से इस छोर
किसी गहरे आंतरिक
द्वंद में
भ्रमित सा प्रतीत हुआ
गहन सोचनीय अवस्था में
सोचता वो
उसने
अधिकार के लिए
धर्म के लिए
कितने निर्दोषों को
मार डाला
मासूमों को पांवों
तले रौंद डाला
क्या मज़हब यही सिखाता
आपस में बैर रखना
मैं निष्फल, निष्पाप
कैसे जी पाऊँगा?
इतने मासूमों की मौत का
बौझ कैसे उठा पाऊँगा?
निर्दोषों को मार के
उनके खून से
अपने हाथ रंग के
कौन सा अधिकार मुझे
मिल गया?
कौन सा खुदा खुश हो गया?

Saturday, January 8, 2011

ये कितने कूल

मानवीय संवेदनाएं
मानवीय मूल्य
कैसे सब जाते भूल
पाँव से रौंद 
जज्बातों को
समझते हैं
ये पाँवो की धूल
कथनी-करनी
में है
अंतर
मधुर वचन
है 
इनके मूल 
है 
अलापते 
अपना राग
छिड़क नमक
ये कहते  फूल  
फिर भी कहता
अपना समाज
ये कितने सभ्य
ये कितने कूल 
  

Wednesday, January 5, 2011

सार

तकदीर ने लिखा जिन्दगी का तराना है 
महबूब के  आगोश में सभी को जाना है      

करते रहते  हैं इंतज़ार ख़ुशी के ख़त का 
खुले खतों में हर्फों सेही दिल बहलाना है 

जो करते  हैं बातें आसमां तक जाने की  
लौट वापस  उनको भी जमीं पे आना  है   

करते हैं  मुहब्बत  जरुरतमंदों की तरह    
क्या दुनिया भी किसी का आशियाना है 

जो तूने लिखा दिया  इतिहास  हो गया    
लकीरों में लिखा   भी कैसे   मिटाना  है 

जीने का सहारा बन ढूढ़ते हैं ताजिंदगी 
तन्हा ही  तो एक  दिन सबको जाना है  

खुद का लिखा न पढ़ पाए "ए जिन्दगी" 
क्या लेकर आये  क्या  ले कर जाना है 

जलाते सभी हैं  चरागों को शाम ढले ही 
''ज्योति'' एक दिन सबको बुझ जाना है 

Monday, January 3, 2011

राज़

उकेर  कर  चित्र केनवास पे छोड़ गया
अजीब चित्रकार था बे-रंग  छोड़ गया

सजा जो मुझको मिली नाकाफी ही रही
राह का पत्थर  था वो राह में छोड़ गया

गुमान था मुझे,वो संग  दिल  सा नही
जिन्दगी के मोड़ पे वो दिल तोड़ गया 

लिखी जो किताब प्यार के हर्फ मिले
स्याह न था वो,स्याह कर छोड़  गया

दर्द जब भी मिला मुझसे मैं हँस के मिली 
आज वो हँस के मिला तो दर्द छोड़ गया

वो था सूरज,चमकता रहा तेज़ धूप बनके
आज मुझसे से मिला तो छाँव छोड़ गया 

मैं जिन्दगी के राज़ कभी भी कह न सकी
लिख राज़ दिल के वो ग़ज़ल में छोड़ गया

वो जब भी जला तो दीप बन जलता रहा
आज ऐसा जला कि "ज्योति" छोड़ गया
hi

Saturday, January 1, 2011



साल बीत रहा !!
कुछ शेष नहीं रहा !!
सुख के कुछ पल
दुःख की वेदी में 
जल गए!! 
सुप्त आशाएं 
फिर जाग उठी !!
दिल गुनगुनाने 
लगा !!
उमंगें हिलोरे 
लेने लगी !!
नया साल जो